मानिकपुर खदान विस्तार को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी, 25 सितंबर की जनसुनवाई का विरोध

कोरबा। मानिकपुर खदान विस्तार परियोजना को लेकर प्रभावित आठ गांवों के ग्रामीणों ने 25 सितंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले लंबित मांगों के समाधान की मांग उठाई है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और अन्य अधिकारों से जुड़े मामले लंबित हैं। ऐसे में समस्याओं का निराकरण किए बिना जनसुनवाई कराना महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

मांगों को लेकर ग्रामीणों ने जनरल मैनेजर कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन किया। इसके बाद बुधवार शाम टीपी नगर स्थित प्रेस क्लब तिलक भवन में भू-विस्थापितों ने प्रेस वार्ता कर अपनी समस्याएं सामने रखीं।
भू-विस्थापितों ने आरोप लगाया कि एसईसीएल प्रबंधन द्वारा प्रभावित परिवारों की समस्याओं के समाधान में भेदभाव किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितने मकानों का मूल्यांकन किया गया है और प्रभावित परिवारों को कितना मुआवजा दिया जाएगा। उनका दावा है कि कुछ मांगें 1963-64 से लंबित हैं।

भू-विस्थापित संगठन के अमन पटेल ने कहा कि ग्रामीण विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन दशकों पुराने लंबित अधिकारों और न्यायोचित समाधान के बिना खदान विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का विरोध किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मानिकपुर क्षेत्र में वर्षों पहले किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन कई परिवार आज भी मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार से जुड़े मामलों के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

21 अगस्त की जनसुनवाई भी हुई थी स्थगित
ग्रामीणों के विरोध के चलते 21 अगस्त 2026 को प्रस्तावित जनसुनवाई स्थगित कर दी गई थी। अब इसके लिए 25 सितंबर की तारीख निर्धारित की गई है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि जब पुरानी समस्याएं ही लंबित हैं, तो नई जनसुनवाई किस आधार पर कराई जा रही है। उन्होंने जनसुनवाई से पहले लंबित मामलों पर ठोस कार्रवाई और समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक करने की मांग की है।
ग्रामीणों ने स्थायी रोजगार के स्थान पर निजी ठेका कंपनियों के माध्यम से रोजगार दिए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि इससे प्रभावित परिवारों की रोजगार संबंधी मूल समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो रहा है।

राखड़ के गुबार से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर का आरोप
भिलाईखुर्द, दर्रीपारा और कोरवा-चांपा मुख्य मार्ग स्थित बजरंग चौक के आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी उठाईं। उनका आरोप है कि बंद खदान के समतलीकरण के बजाय वहां राखड़ का ढेर जमा हो गया है, जिससे धूल और राख के गुबार उड़ते हैं। ग्रामीणों के अनुसार इससे हवा, फसलों और हसदेव नदी के प्रदूषित होने का खतरा बना हुआ है।

ग्रामीणों ने एसईसीएल प्रबंधन और जिला प्रशासन से प्रभावित परिवारों के साथ औपचारिक बैठक कर समस्याओं के समाधान की मांग की है। उन्होंने प्रत्येक परिवार के लंबित मामलों की सूची तैयार कर पारदर्शी तरीके से उनके निराकरण की समयसीमा घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि विकास की प्रक्रिया प्रभावित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी किए बिना आगे बढ़नी चाहिए।

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