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शब्दों के शिल्पी, सत्य के प्रहरी: स्वर्गीय सुरेशचंद्र रोहरा जी की जयंती पर शत-शत नमन

कोरबा, 25 जून 2026।आज वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, अधिवक्ता एवं समाज चिंतक स्वर्गीय सुरेशचंद्र रोहरा जी की जयंती पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धा एवं सम्मान के साथ याद किया जा रहा है। 25 जून 1967 को जन्मे स्व. रोहरा जी ने अपने जीवन को समाज, साहित्य और पत्रकारिता के लिए समर्पित कर दिया था। उनकी लेखनी ने न केवल समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया, बल्कि आम जनमानस की पीड़ा, संघर्ष और संवेदनाओं को भी शब्दों में जीवंत किया।स्व. सुरेशचंद्र रोहरा जी दैनिक समाचार पत्र लोकसदन के संपादक रहे तथा मासिक पत्रिका “गांधीस्वर” के माध्यम से वैचारिक एवं जनपक्षधर पत्रकारिता को नई दिशा दी। वे निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और जनहित को पत्रकारिता का मूल आधार मानते थे। उनकी कलम हमेशा समाज के वंचित, शोषित और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ बनी रही।साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। उनकी अनेक रचनाओं में समाज की वास्तविकताओं और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण देखने को मिलता है। उनके चर्चित उपन्यास “जिंदगी कोयला-कोयला जिंदगी” में कोयलांचल क्षेत्र के श्रमिकों, आम नागरिकों और संघर्षरत जीवन की मार्मिक कहानी को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि कोयला अंचल के लोगों के जीवन, दर्द, संघर्ष और उम्मीदों का जीवंत दस्तावेज माना जाता है। इस रचना ने पाठकों को समाज के उस पक्ष से परिचित कराया, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में काले धब्बे, हे बापू, जैसे जल बिन मछली, मोर हूं या मोर सहित अनेक रचनाएँ शामिल हैं, जिन्होंने साहित्य जगत में उन्हें विशेष पहचान दिलाई।स्व. सुरेशचंद्र रोहरा जी का जीवन सादगी, ईमानदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता और मानवीय मूल्यों का प्रतीक रहा। उनकी लेखनी, विचार और आदर्श आज भी पत्रकारिता एवं साहित्य से जुड़े लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।उनकी जयंती के अवसर पर परिवारजनों, साहित्यकारों, पत्रकारों, पाठकों एवं शुभचिंतकों ने उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

“शब्द भले ही मौन हो जाएं, लेकिन महान व्यक्तित्व की पहचान और उनके विचार सदैव जीवित रहते हैं।”

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