
आज विशाखापट्टनम हिंदी साहित्य संस्था सृजन ने अपने 173 वें कार्यक्रम के रूप में विविध विधाओं की साहित्य चर्चा का ऑनलाइन आयोजन किया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी कहानियाँ, लेख, कवितायें और व्यंग्य प्रस्तुत किए। कार्यक्रम सुश्री वाराणसी रमणी के सरस्वती वंदना से आरंभ हुआ। स्वागत भाषण करते हुए सीमा वर्मा ने सृजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और कहा मासिक बैठकों द्वारा नए और पुराने रचनाकारों को हिंदी साहित्य सृजन के प्रति प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया जाता है। इस तरह के विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा नई प्रतिभाएं लेखन की ओर अग्रसर होती हैं।
सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने अपने उद्बोधन में कहा केवल कविता तक ही सीमित न रहकर गद्य साहित्य सृजन के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन इस तरह के कार्यक्रमों से ही संभव है, कवितायें ही नहीं हमारे साथी गद्य लेखन भी उसी प्रभावशीलता के साथ करते हैं, जो हम अपने कार्यक्रम में अनुभव करेंगे। कार्यक्रम का प्रभावी, सफल और सुचारू संचालन सृजन के अध्यक्ष डॉ नीरव वर्मा ने किया।
कार्यक्रम में भगवतुला सत्यनारायण मूर्ति ने लेख -गुमनाम स्वतन्त्रता सेनानी उन आज़ादी के सूरमाओं का परिचय दिया जो अज्ञात हैं या इतिहास में नहीं है। वाराणसी रमणी ने लेख –संस्कारों की विरासत : शुरुआत हम से हो में वर्तमान समय में संस्कार और मानवता की महत्ता को बखूबी प्रतिपादित किया। एल चिरंजीव राव की कहानी – मैं राजेश बाबू में परिवार, बुजुर्गों की भूमिका, बदलती जीवन-शैली और पारिवारिक विघटन का भाव बहुत अच्छी तरह उभारा है। सामयिक कहानी का प्रभाव अच्छा है।
सीमा वर्मा ने कहानी – मैं प्रवासी नहीं में संयुक्त परिवार के अपनत्व, प्रवास के अकेलेपन और अपनी जड़ों से भावनात्मक जुड़ाव को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। विशेष रूप से अंतिम पंक्ति—“नहीं-नहीं, मैं प्रवासी नहीं…”—कहानी को प्रभावशाली समापन देती है।
बी राधा रानी ने अपने लेख : शब्दों का दलदल में हम जिन शब्दों में बार बार फँसते हैं, धँसते हैं और निकल नहीं पाते जो हमारी अभिव्यक्ति को पंगु बनाते हैं का उल्लेख किया। डॉ मधुबाला कुशवाहा की कहानी एक सवाल बाक़ी था पिता के प्रेम और संरक्षण के साथ-साथ बेटी की अनकही इच्छाओं को बहुत संवेदनशीलता से सामने लाती है। अंतिम डायरी-पंक्ति कहानी का सार अत्यंत प्रभावी ढंग से कह देती है—पिताजी ने मेरी ज़िंदगी के लिए बहुत सारे रास्ते चुने… बस एक बार यह पूछना भूल गए कि मुझे जाना किस रास्ते पर था।
वरिष्ठ सदस्य जाने माने कवि रामप्रसाद यादव ने दो कवितायें – थूकदान और कलिंग की औरतें पढ़ीं जिनमें वर्तमान समय की स्थिति और समाज की मानसिकता को प्रतीकों के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किया गया। मीना गुप्ता ने लेख : आज के संदर्भ में मानवता – हम कितने ज़िम्मेदार? में मानवीय मूल्यों, पारिवारिक संबंधों, संस्कारों, युवा पीढ़ी और कथनी-करनी के अंतर पर विचार किया गया है। लेख प्रभावी बन पड़ा है।
एसवीआर नायडू की हास्य कविता एक हल्की-फुल्की हास्य रचना है, जिसमें मंच, माइक, मोबाइल, परिवार और नायुडू जी के चुटीले अंदाज़ को हास्य के साथ प्रस्तुत किया गया है। डॉ के अनीता का लेख : ज़िंदगी –एक खूबसूरत सफर लेख में जीवन के विभिन्न पड़ावों, तकनीक और मानवीय संबंधों, समय के महत्व तथा छोटी-छोटी खुशियों को जीवन की वास्तविक संपदा के रूप में सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। डॉ. शकुंतला बेहुरा कविता – दादी माँ की सुने कौन? नई पीढ़ी की व्यस्तता और मोबाइल-कंप्यूटर की दुनिया के बीच अकेली पड़ती दादी माँ की स्मृतियों, भावनाओं और एकाकीपन को अत्यंत मार्मिक स्वर देती है।
डॉ वंदना काले के लेख एक अविस्मरणीय अनुभव में कमजोरी को अपनी शक्ति में बदलने की प्रेरणा देने वाली अध्यापिका और उनकी छात्रा की यह प्रेरक घटना बहुत सुंदर है। दोहे के माध्यम से दिया गया संदेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।
डॉ टी महादेव राव के व्यंग्य – हाय मैं कहाँ फंसा? वरिष्ठ कवियों के हास्यपूर्ण चरित्र-चित्रण, आधुनिक कविता और उसके प्रयोगों पर व्यंग्य तथा अंतिम पंक्तियाँ रचना को विशेष रूप से मनोरंजक बनाती हैं। डॉ नीरव कुमार वर्मा ने कहानी – चौकी का पाठ किया, जिसमें जगत चाचा की “चौकी” केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन, निःस्वार्थ सेवा और परिवार में उनके अदृश्य योगदान का प्रतीक बनकर सामने आती है। अंतिम दृश्य—पिताजी के हाथ के साथ चौकी को हाथ से दबाना—कहानी को बहुत मार्मिक और सार्थक अंत देता है। अंत में पारसनाथ यादव ने अपनी रचना आओ अवगत करायें पढ़ी जो म एहाभारत पर आधारित लघु कथा थी।
प्रस्तुत प्रत्येक रचना पर प्रतिभागियों ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुये चर्चा में भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में डॉ टी महादेव राव ने सारे कार्यक्रम की संक्षेपिका प्रस्तुत करते हुये सभी रचनाकारों का आभार माना। सभी का मत था कि इस तरह चर्चा विषयक कार्यक्रमों से ऊर्जा मिलती है और लिखने की प्रेरणा मिलती है, इस तरह के कार्यक्रम होते रहना चाहिए।
डॉ टी महादेव राव
सचिव सृजन
वि शा ख प ट न म





