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सृजन की ऑनलाइन विविध विधाओं की साहित्य चर्चा संपन्न

सृजन ने आज अपने 170वें कार्यक्रम के रूप में ऑनलाइन हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की रचनाओं पर साहित्य चर्चा का आयोजन किया। सृजन के रचनाकारों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की जिस पर सदस्यों द्वारा विस्तृत चर्चा हुई।

कार्यक्रम का आरंभ डॉ के अनिता के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने बताया सृजन न केवल साहित्य के प्रति प्रतिबद्ध संस्था है बल्कि नए और पुराने रचनाकारों को साहित्य सृजन के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है। हिंदीतर क्षेत्र में हिंदी साहित्य की अलख जगाने को प्रतिबद्ध यह संस्था लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही है। कार्यक्रम का संचालन करते हुये सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने पिछले एक माह से सृजन के साथियों की प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं का उल्लेख करते हुये कहा निरंतर पढ़ें, लिखें और साहित्य क्षेत्र में आगे बढ़ें तभी हमारी कोशिशों को बल मिलेगा और साहित्य समृद्ध होगा। उन्होंने कार्यक्रम का संचालन सफलतापूर्वक किया।

सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत हुई जिसे प्रस्तुत किया एल चिरंजीव राव ने। कार्यक्रम में
सीमा वर्मा (हैदराबाद तेलंगाना) ने अपनी कहानी “खामोशी” में दृढ़ संकल्प के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करती युवती के बात बखूबी प्रस्तुत किया। डॉ वंदना काले (रायपुर छत्तीसगढ़) ने अपने लेख “स्वच्छ ऊर्जा आत्म निर्भर भारत का मुख्य आधार” में पर्यावरण और प्रदूषण की सामयिक स्थितियाँ और उनसे संबन्धित समस्याएँ और समाधान पर अपनी बात रखी। एल चिरंजीव राव (विजयनगरम) ने अपने लेख “यात्राएं मानव जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता” में यात्राएं और उनके प्राप्त ज्ञान, खुली सोच और आनंद की बात को विश्लेषित रूप में बताया। डॉ के अनिता (विशाखापटनम) ने अपने लेख “पर्यावरण और प्रकृति प्रदूषण” में पर्यावरण सरक्षण पर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेने और जीव जगत के साथ मानव संसार को भी बचाने की बात कही। वाराणसी रमणी (हैदराबाद) ने अपने चिंतनमय लघु निबंध “दुविधा” में कहा मानव की दुविधाएँ विकल्पों की बहुतायत से बढ़ती जाती हैं, इसलिए मन को शांत और सकारात्मक रखें तो दुविधा की स्थिति बदल सकती है। भारती शर्मा (विशाखापटनम) ने एक “ग़ज़ल” प्रस्तुत की। बी राधारानी (विशाखापटनम) ने अपने निबंध “आध्यात्मिक चिंतन और भारतीय साहित्य” पर अपने विचार रखे जिनमें प्राचीन कथाओं और पुराणों के दृष्टांत थे। डॉ मधुबाला कुशवाहा (विशाखापटनम) ने अपनी कविता “उदासी अच्छी है पर ……” में कहा उदासी से चिंतन में गहनता आती है लेकिन यह स्थाई नहीं होनी चाहिए। एस वी आर नायुडु (विशाखापटनम) लेख “एन एल पी का परिचय” में विशेष प्रशिक्षण न्यूरो लिंगुवल प्रैक्टिस के बारे में सरल शब्दों में समझाया। डॉ टी महादेव राव (विशाखापटनम) ने अपनी व्यंग्य रचना “समयानुकूल संस्कार आज का व्यवहार” में वर्तमान बदलते विचार, मौकापरस्त व्यवहार पर मारक व्यंग्य प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का समापन वाराणसी रमणी के द्वारा सम्पूर्ण कार्यक्रम का सार संक्षेप प्रस्तुति के साथ उनके धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन , विशाखापटनम

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