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सावनी कविताओं से सराबोर शब्दों का संसारसृजन ने किया पावस कविता चर्चा का आयोजन

विशाखापट्टनम की सक्रिय हिंदी साहित्य संस्था सृजन ने आज अपने 172 वें कार्यक्रम के रूप में पावस साहित्य चर्चा का ऑनलाइन आयोजन किया। कार्यक्रम डॉ के अनीता के सरस्वती वंदना से आरंभ हुआ। स्वागत भाषण करते हुए डॉ मधुबाला कुशवाहा ने सृजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और कहा मासिक बैठकों द्वारा नए और पुराने रचनाकारों को हिंदी साहित्य सृजन के प्रति प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया जाता है।
सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने अपने उद्बोधन में कहा साहित्य एक गंभीर प्रक्रिया है जैसा कि मेरे अपने अध्ययन लेखन और अनुभव से मैंने जाना। चिंतन और वैचारिक मंथन से ही अच्छी रचना का जन्म होता है। पावस और कविता का अटूट बंधन है जो हम अपने कार्यक्रम में अनुभव करेंगे। कार्यक्रम का सफल और सुचारू संचालन सुश्री वाराणसी रमणी (हैदराबाद) ने किया।
सबसे पहले एल चिरंजीव राव (चेन्नई) ने अपनी दो अलग बिंबों की कविता बारिश और मरुस्थल में कहा मरूस्थल कह रहा है ,बारिश से/तेरी हर बूंद का आसरा है मुझको/फिर चाहो साथ होकर पवन के/ तुम मुझसे दूर भी चले जाना। डॉ शकुंतला बेहुरा (भुवनेश्वर) ने “सावन” रचना में किसानों के प्रति आशावादी स्वर में कहा हर साल आती रहेगी सावन की घटा समय पर/ लेंगे मधुर आनंद सभी मिलजुल कर/सब साथ मनाएं त्यौहार /साथ किसानों के लिए भी आएगी/ एक नई सुंदर सुबह। एसवीआर नायडू ने हास्य कविता पावस कविता में लिखा ऋतु बड़ी सुहानी/हरियाली की नई कहानी/लेकिन बिजली जब चली जाए/मोबाइल की बैटरी भी घबराए!
सृजन के वरिष्ठ कवि राम प्रसाद यादव की कविताओं की गहनता और प्रभावशीलता एक अलग दुनिया में हमें ले जाती हैं। बारिश कविता में उनके बिम्ब और संक्षिप्त सी अभिव्यक्ति अलग संसार बनाती है। वे सुनाते हैं बारिश! तुम/छत से नहीं/दरवाजे से आओ/देखना है/तो खिड़की से देखो/ दीवारों की सेंधमारी मत करो/रात भर बरसती रही/और अब हांफ रही हो/ थोड़ा सुस्ता लो।
डॉ मधुबाला कुशवाहा ने “बारिश की रिमझिम में” शीर्षक की अपनी रचना में जीवन की विविध स्थितियों का सुंदर और प्रभावी चित्रण प्रस्तुत किया। बारिश की रिमझिम में जब धरती मुस्काती है/ हर बूँद स्वर्ग से उतरी कविता बन जाती है। डॉ के अनीता की कविता “बारिश” में पढ़ा दूर गगन में बादल घिरते/हवा अचानक बदल जाती है/सूनी धरती की आँखों में/ एक नई चमक उतर आती है। पारसनाथ यादव (भरूच गुजरात) ने अपनी रचना बरसात में वर्षा ऋतु के साथ मानवीय संबंध के बात कही। सृजन के सचिव और क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ टी महादेव राव ने अपनी कविता पढ़ी ”वृष्टि का गीत” जिसमें वे कहते हैं पावस में थि‍रकते स्वाति‍ के सुवन/ हो रहा चंचल यह संन्या्सी मन/ कि‍या नि‍र्वाह सृष्टि ‍ ने सार्वभौम रीत/ पाया है चातक ने अपना मन मीत/मेघों ने गाया है वृष्टि ‍ का गीत। कविता चर्चा की संचालिका सुश्री वाराणसी रमणी ने वर्षा पर अपना काव्य प्रस्तुत किया “सावन”। तू केवल ऋतु नहीं/प्रकृति का मौन संदेश है/तू केवल ऋतु नहीं/जीवन का अनुपम उपदेश है। डॉ वंदना काले (रायपुर छत्तीसगढ़) भी कार्यक्रम में भाग लिया।
प्रस्तुत प्रत्येक रचना पर प्रतिभागियों ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुये चर्चा में भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में डॉ के अनीता ने सारे कार्यक्रम की संक्षेपिका प्रस्तुत की और उपस्थित सभी कवियों का आभार माना। सभी का मत था कि इस तरह विशेष विषयक कार्यक्रमों से ऊर्जा मिलती है और इस तरह के कार्यक्रम होते रहना चाहिए।
डॉ टी महादेव राव
सचिव सृजन
विशाखापटनम (आंध्र प्रदेश)

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