
विशाखापटनम। हिंदी साहित्य संस्था सृजन, विशाखापटनम का 171वां मासिक कार्यक्रम ऑनलाइन काव्य साहित्य चर्चा के रूप में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम में संस्था के रचनाकारों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया, जिन पर साहित्यकारों एवं सदस्यों ने विस्तार से चर्चा करते हुए रचनाओं के भाव, शिल्प और सामाजिक सरोकारों पर विचार रखे। कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ सदस्य एल. चिरंजीव राव के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि सृजन केवल काव्य पाठ और विमर्श का मंच नहीं, बल्कि एक ऐसी रचनात्मक यात्रा है जहां शब्दों को संस्कार, विचारों को दिशा और साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व मिलता है। कार्यक्रम का संचालन भागवतुला सत्यनारायण मूर्ति ने अपनी विशेष शैली में किया। शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई, जिसे एल. चिरंजीव राव ने लिखा और प्रस्तुत किया। संस्था के सचिव डॉ. टी. महादेव राव ने पिछले एक माह की साहित्यिक गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत करते हुए सभी रचनाकारों से निरंतर लेखन और सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। काव्य चर्चा के दौरान डॉ. के. अनिता (विशाखापटनम) ने “डिजिटल युग और मानवीय संवेदनाएं” कविता के माध्यम से डिजिटल जीवन में कम होती मानवीय संवेदनाओं पर प्रकाश डाला। वाराणसी रमणी (हैदराबाद) ने “बुलबुला” रचना में जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मज्ञान के रहस्य को प्रस्तुत किया।एल. चिरंजीवी राव ने “तकदीर बदलते देर नहीं लगती” कविता में दृढ़ संकल्प और प्रयासों की शक्ति को रेखांकित किया। डॉ. शकुंतला बेहुरा (भुवनेश्वर) ने “गांव से शहर तक” कविता में प्रकृति और आधुनिक शहरी जीवन के अंतर को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।बी. राधारानी ने “मेरा दर्द” रचना के माध्यम से जीवन संघर्ष और संतोष के भाव व्यक्त किए। वीरेंद्र राय (चंडीगढ़) ने “प्याले में कुछ बूंदे चाय की” कविता में चाय की बूंदों को यादों और बीते समय का प्रतीक बनाया। डॉ. वंदना काले (रायपुर) ने “हम सृजन में आए हैं” कविता के जरिए साहित्यिक मंच की सकारात्मक ऊर्जा को दर्शाया। सीमा वर्मा (हैदराबाद) ने “सीढ़ी” कविता में जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया। डॉ. मधुबाला कुशवाहा (विशाखापटनम) ने “मैंने जीना सीख लिया” कविता में सकारात्मक सोच और संघर्षों के बीच आगे बढ़ने का संदेश दिया।एसवीआर नायडू ने हास्य कविता “मेरा मोबाइल ही देसी” के माध्यम से मोबाइल के बढ़ते प्रभाव और उससे जुड़ी समस्याओं पर व्यंग्य किया। डॉ. टी. महादेव राव ने “मैं ही अक्षर हूं” कविता में अक्षर, शब्द और साहित्य की भावनात्मक शक्ति को अभिव्यक्त किया। संस्था अध्यक्ष नीरव वर्मा (हैदराबाद) ने “पतंग” कविता के माध्यम से वर्तमान परिस्थितियों और जीवन के उतार-चढ़ाव को प्रतीकों के जरिए प्रस्तुत किया। कार्यक्रम संचालक बी. एस. मूर्ति ने “सुनहरे मुहावरे” कविता में आज की पीढ़ी और सामाजिक परिस्थितियों पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया। अंत में डॉ. के. अनिता ने कार्यक्रम का सार प्रस्तुत करते हुए सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। संस्था की ओर से जानकारी दी गई कि सृजन का अगला कार्यक्रम 9 अगस्त 2026 को आयोजित किया जाएगा।— डॉ. टी. महादेव राव, सचिव, सृजन विशाखापटनम
